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क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं जकरबर्ग? फेसबुक के आगे बौनी हैं सरकारें?

शायद इस बार भी फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग सिर्फ माफी मांगकर बच लेंगे, क्योंकि सरकारें अब फेसबुक के सामने बौनी हो गई हैं।

Is Zuckerberg Risks for National Security?

Highlights

  • क्या डाटा की सौदेबाजी के बिना नहीं चल सकता जकरबर्ग का कारोबार?

  • चीनी कंपनियों को डाटा देने पर क्यों रिपब्लिक और डेमोक्रेट कर रहे हैं आलोचना?

  • क्रैबिज एनालिटिका के बाद फिर से डाटा विवाद में फंस गए हैं जकरबर्ग।

कैंब्रिज एनालिटिका डाटा लीक मामले को अभी चार महीने भी पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन डिजिटल दुनिया का चहेता फेसबुक फिर से विवादों में घिर गया है। इस बार भी पहले की ही तरह आरोप संगीन हैं। और यूजर्स के डिजिटल लाइफ की धड़कन यानी उसका डाटा फिर दांव पर है। यकीन के साथ कहा जा सकता है कि इस बार भी फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग सिर्फ माफी मांगकर बच लेंगे, क्योंकि शायद दुनिया के किसी मुल्क की सरकार के बस में अब फेसबुक के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की या तो इच्छा शक्ति नहीं रही, या फिर सरकारें इस महाजाल के आगे बौनी हो गई हैं।

अगर ऐसा नहीं होता तो अमेरिकी कांग्रेस के सामने पेश हुए जकरबर्ग से इतने हल्के-फुल्के सवाल कभी न होते और न ही जकरबर्ग बेशर्मों की तरह बार-बार माफी मांगते। वो भी तब जब साफ-साफ उनपर राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों को प्रभावित करने का आरोप लगा हो। अभी इस मामले में जांच किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है लेकिन फेसबुक दूसरा कांड कर चुका है। इस बार भी उसने अपने यूजर्स के डाटा को दांव पर लगाया है।

क्या डाटा की सौदेबाजी के बिना नहीं चल सकता जकरबर्ग का कारोबार?
यह तो साफ है कि जकरबर्ग का कारोबार अब बिना यूजर्स के डाटा को दांव पर लगाये नहीं चल सकता है। अगर ऐसा नहीं होता तो वो चार चीनी कंपनियों के साथ गुपचुप तरीके से डाटा के एक्सेस के लिए साझेदारी न करते, और न ही बेशर्मों की तरह इस बात को स्वीकार करते की उसने यह समझौता किया है।

दरअसल, इस बार भी पिछली बार की ही तरह न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक रिपोर्ट प्रकाशिक की जिसने फिर से फेसबुक को विवादों में ला खड़ा किया। इसमें फेसबुक पर 60 डिवाइसिस कंपनियों के साथ डाटा एक्सेस की साझेदारी करने का आरोप लगाया। इसके बाद जब बवाल हुआ तो फेसबुक ने बयान जारी कर स्वीकार किया कि उसने चार चीनी कंपनियों के साथ डाटा की सौदेबाजी की है। इन कंपनियों में ओप्पो,हुवावे, लेनोवो और टीसीएल के नाम शामिल हैं। हालांकि, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में अमेजन,एप्पल, सैमसंग जैसे दुनिया की तमाम दिग्गज कंपनियों के नाम का खुलासा हुआ था। लेकिन, इनमें से सिर्फ एप्पल के सीईओ का ही बयान आया है जिनका कहना है कि उनकी कंपनी ने न ही कभी जकरबर्ग से डाटा के एक्सेस के लिए कोई डील की और न ही डाटा लिया।

क्या था इस डील में ऐसा जो प्राइवेसी के लिए है चिंताजनक?
फेसबुक इस्तेमाल करने वाले यूजर्स इस प्लेटफॉर्म पर अपने दोस्तों, रिश्तेदारों या दूसरों के साथ अपनी बेहद निजी जानकारी भी साझा करते हैं। यूजर्स फेसबुक को इस जानकारी को देखने की इजाजत देते हैं। यानी फेसबुक के पास दुनिया के सारे यूजर्स की जानकारी है। लेकिन, प्राइवेसी पॉलिसी के तहत फेसबुक इसका एक्सेस किसी दूसरी कंपनी को नहीं दे सकता है। ऐसे में अगर स्मार्टफोन बनाने वाली इन कंपनियों को फेसबुक ने इसका एक्सेस दे दिया तो क्या होगा? यह डील कुछ ऐसी ही थी। इसमें फेसबुक डिवाइस बनाने वाली कंपनियों को यूजर्स की सारी जानकारियां का एक्सेस दे रहा था।

क्यों रिपब्लिक और डेमोक्रेट कर रहे हैं जकरबर्ग की आलोचना?
इस डील में जो सबसे अहम है वो है हुवावे कंपनी। हुवावे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी है। यह कंपनी अमेरिका में पहले से ही विवादों में है। हुवावे को अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी ने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। इसके स्मार्टफोन से जासूसी के खतरे का अंदेशा जताया गया है। पेंटागन ने तो मई में अमेरिकी मिलिट्री क्षेत्र में हुवावे के फोन का इस्तेमाल और बेचने पर पाबंदी लगाई है।

इंटेलीजेंस ने आशंका जताई थी कि हुवावे जासूसी के जरिए अमेरिकी की गोपनीय जानकारियों को चीन की सरकार को दे सकता है। वहीं इस मामले में ऑस्ट्रेलियाई सरकार जकरबर्ग को पूछताछ के लिए बुलाने पर विचार कर रही है। न्यूयॉर्क में फेसबुक के शेयरों में गिरावट भी देखी गई है। हालांकि यह मामला अभी लंबा चलने वाला है और देखना होगा कि इस बार जकरबर्ग क्या सिर्फ माफी मांगने से ही छूट जाएंगे या फिर उनके खिलाफ कार्रवाई भी होगी।

  • Published Date: June 7, 2018 1:18 PM IST
  • Updated Date: June 7, 2018 1:26 PM IST